दोस्तों…
आज कुछ शब्द सचमुच ख़ामोश लग रहे हैं।
ऐसा लग रहा है जैसे ग़ज़लों की दुनिया का एक बहुत अपना चेहरा धीरे से हमसे दूर चला गया हो।
Bashir Badr साहब…
एक ऐसा नाम, जिसे सिर्फ़ उर्दू शायरी नहीं,
बल्कि महसूस करने वाला हर दिल जानता है।
सच कहूँ…
बशीर बद्र साहब को सुनना हमेशा ऐसा लगता था
जैसे कोई बहुत अपनापन लेकर ज़िंदगी की बातें कर रहा हो।
न आवाज़ में शोर…
न अल्फ़ाज़ में दिखावा…
बस सादगी… और दिल को छू लेने वाली बात।
उन्होंने मोहब्बत लिखी…
लेकिन सिर्फ़ प्रेम की नहीं।
उन्होंने इंसानों के बीच की दूरियाँ लिखीं…
रिश्तों की थकान लिखी…
अकेलेपन की आवाज़ लिखी…
और उम्मीद भी लिखी।
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता…”
देखिए ना…
सिर्फ़ दो लाइनें…
लेकिन कितने रिश्तों की पूरी कहानी कह जाती हैं।
उनकी शायरी में शिकायत भी होती थी,
लेकिन तहज़ीब के साथ।
दर्द भी होता था,
लेकिन उम्मीद का हाथ पकड़े हुए।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…”
ये शेर सुनते ही ऐसा लगता है
जैसे कोई अपनेपन से कह रहा हो —
“अच्छी यादों को संभाल कर रखिए…
यही मुश्किल वक़्त में रोशनी बनती हैं।”
दोस्तों,
आज की दुनिया में लोग बहुत जल्दी बदल जाते हैं…
बहुत जल्दी दूर हो जाते हैं…
लेकिन बशीर बद्र साहब की ग़ज़लें हमें रिश्तों की अहमियत याद दिलाती हैं।
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो…”
आज भी ये शेर उतना ही सच लगता है
जितना बरसों पहले था।
उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती यही थी कि
उन्होंने मुश्किल बातों को भी आसान शब्दों में कहा।
इसीलिए उनकी शायरी किताबों से निकलकर लोगों की ज़िंदगी तक पहुँची।
किसी की तन्हा रातों में…
किसी के अधूरे प्यार में…
किसी की चुप यादों में…
आज भी बशीर बद्र साहब मौजूद हैं।
और शायद हमेशा रहेंगे।
क्योंकि कुछ लोग दुनिया से जाते नहीं…
वो अपने शब्दों में बस जाते हैं।
बशीर बद्र साहब…
आपकी ग़ज़लें, आपकी सादगी, आपका एहसास…
हमेशा लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेगा।
आपको Radio Junction परिवार की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
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